देश का मिजाज: नोट... देश का मिजाज: नोटबंदी से कुछ अच्छा ही होगा!

कभी किसी नीतिगत फैसले ने देश की अर्थव्यवस्था पर इतना दीर्घकालिक असर नहीं छोड़ा था, जैसा पिछले नवंबर में बड़े नोटों को बंद करने के सरकार के फैसले से हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर को राष्ट्र के नाम एक संबोधन में ऐलान किया कि आधी रात से 500 रु. और 1,000 रु. के नोट चलन से बाहर हो जाएंगे. उनके शब्दों में यह कदम काला धन जमा करने वालों के खिलाफ  किया गया सबसे बड़ा हमला था, लेकिन इस कदम से चलन में मौजूद 86 फीसदी मुद्रा के भी खत्म हो जाने का अंदेशा था जिससे रातोरात 15.4 लाख करोड़ रु. के नोट रद्दी हो जाने थे. इस फैसले ने कई कारोबारी क्षेत्रों पर कड़ी मार की, जिनमें सबसे ज्यादा असर उस अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ा, जो आबादी के 80 फीसदी हिस्से को रोजगार मुहैया कराता है.

अनुमानों के मुताबिक, अर्थव्यवस्था इसके बाद कम से कम एक फीसदी की दर से सुस्त पड़ जाएगी (क्रिसिल का कहना है कि 2016-17 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.6 फीसदी के पूर्वानुमान से गिरकर 6.6 फीसदी पर आ जाएगी). सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़े कहते हैं कि जीडीपी में 1.6 फीसदी की गिरावट आएगी. नकदी संकट के कारण लोगों को एटीएम और बैंकों के बाहर पैसे निकालने या नोट बदलने के लिए जो लंबी कतारें लगानी पड़ीं, उन दिक्कतों के समाप्त होने के बाद अब असल चिंता आर्थिक मोर्चे को लेकर है.

नोटबंदी से चाहे कितना ही कष्ट क्यों न हुआ हो, लेकिन ऐसा लगता है कि मोदी को इससे बहुत लाभ मिला है. मध्यम अवधि का लाभ यह है कि इस फैसले से उन्होंने इस साल फरवरी और मार्च में चुनाव में जा रहे पांच राज्यों के मतदाताओं के बीच अपनी राह बनाई है. देश का मिज़ाज सर्वेक्षण से यह बात साफ  होती है. इसमें शामिल 45 फीसदी लोगों का मानना है कि नोटबंदी काले धन और भ्रष्टाचार को कम करने में मददगार होगी, साथ ही 35 फीसदी का मानना है कि इसका अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर होगा. केवल 7 फीसदी ऐसे हैं जो मानते हैं कि यह कदम उत्तर प्रदेश, पंजाब और दूसरी जगहों पर बीजेपी के प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करने के लिए उठाया गया है.

इस सर्वेक्षण में शामिल 56 फीसदी लोगों का कहना था कि नोटबंदी ने मोदी सरकार को लोकप्रिय बनाया है और इससे उसे राज्यों के चुनाव जीतने में मदद मिलेगी. केवल 28 फीसदी लोग इसका उलटा मान रहे हैं. यह दिलचस्प है क्योंकि उत्तर प्रदेश उन राज्यों में है जहां नोटबंदी के बाद रोजगार गंवाने के चलते सबसे ज्यादा संख्या में मजदूर महानगरों और शहरों से वापस अपने गांवों को लौटे हैं. क्या नोटबंदी से आम आदमी को फायदे के बजाए ज्यादा कष्ट झेलना पड़ा है, इस सवाल के जवाब में 20 फीसदी लोग इस बात से सहमत थे कि इससे छोटे कारोबार नष्ट हुए हैं और रोजगार खत्म हुआ है. इंडियास्पेंड नाम की एक अलाभकारी संस्था का अनुमान है कि नोटबंदी से ऐसे 48.2 करोड़ लोग प्रभावित होंगे, जिनकी आय नकद में थी. अर्थशास्त्री गुरचरण दास कहते हैं कि जीडीपी में एक फीसदी की गिरावट से 60 लाख रोजगार खत्म होंगे.

कुल मिलाकर 51 फीसदी लोग मानते हैं कि नोटबंदी से अफरा-तफरी मची है, नकदी का संकट पैदा हुआ है, एटीएम के बाहर लंबी कतारें लगी हैं और उनमें खड़े-खड़े लोगों की मौत हुई है. ऐसा स्वीकार करते हुए भी 45 फीसदी लोगों ने माना है कि आगे चलकर इसका लाभ मिलेगा और भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी. चाहे जो हो, चुनाव पूर्व अपनी रैलियों में मोदी लगातार इस फैसले को गरीब-समर्थक ही बताते रहे हैं, चूंकि भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब आदमी ही होता है.

नकदी संकट के लिए लोग अगर सीधे मोदी की आलोचना नहीं कर रहे हैं तो उसकी एक वजह यह है कि उन्हें लगता है कि नोटबंदी के फैसले में नहीं, उसके लागू किए जाने में दिक्कत थी. आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि ग्रामीण भारत में 51 फीसदी और शहरी इलाकों में 61 फीसदी लोग यह मानते हैं कि या तो फैसले को गलत तरीके से लागू किया गया या फिर उसे और अच्छे से लागू किया जा सकता था. ज्यादातर को यह लगता है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने जिस तरीके से नोटबंदी को बरता है, उससे उसकी विश्वसनीयता कम हुई है. नोटबंदी के शुरुआती 50 दिनों के भीतर 74 अधिसूचनाएं जारी करने वाले रिजर्व बैंक के बारे में 53 फीसदी लोगों को लगता है कि इससे पैदा हुए भ्रम ने बैंक की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाई है.

इससे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि नोटबंदी के उद्देश्य को लेकर सरकार की लगातार दी गई नई दलीलों के प्रति लोग आलोचनात्मक नहीं हैं—सरकार ने पहले काले धन को खत्म करने की दलील दी, फिर आतंकवाद के वित्तपोषण से होते हुए कैशलेस भारत तक पहुंच गई. शहरी क्षेत्र में 51 फीसदी लोगों का मानना है कि नोटबंदी से डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन मिलेगा. गांवों में ऐसा मानने वाले 64 फीसदी लोग हैं जो ज्यादा दिलचस्प है, चूंकि गांवों में डिजिटल भुगतान के इंतजामात बेहद खराब हैं. ऐसा लगता है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था वाला संदेश ग्रामीण आबादी पर सकारात्मक ढंग से असर कर गया है.

नोटबंदी के बाद हुए कष्ट की भरपाई करने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए? कुल 68 फीसदी लोगों का मानना है कि आगामी बजट में आयकर को कम किया जाना चाहिए. डिजिटल भुगतान में लोगों का भरोसा जगाने के लिए भी सरकार को बहुत कुछ करने की जरूरत है. इस दिशा में 49 फीसदी लोग डिजिटल भुगतान के नए माध्यमों को जोखिम भरा मानते हैं जबकि केवल 37 फीसदी ऐसा मानते हैं कि डिजिटल माध्यम पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी है. इसके अलावा एक उम्मीद यह भी है कि सरकार को नोटबंदी के बाद भी भ्रष्टाचार को कम करने के कदम उठाने होंगे. इसकी शुरुआत करते हुए राजनैतिक दलों को पहले अपना घर साफ  करना होगा क्योंकि सभी राष्ट्रीय दल इस मामले में अपारदर्शिता बरतने के दोषी हैं. 61 फीसदी लोगों की इच्छा है कि सरकार राजनैतिक दलों के चुनावी चंदे के खिलाफ कोई कार्रवाई करे. 

कुल मिलाकर मोदी की नीतियों के समर्थन में एक स्वीकार्यता देखने को मिली, जहां 60 फीसदी लोगों ने कहा कि उनका प्रदर्शन मनमोहन सिंह के यूपीए से बेहतर है—यह अगस्त 2016 के देश का मिज़ाज सर्वे से 5 फीसदी की बढ़ोतरी थी जबकि फरवरी 2016 के मुकाबले यह 13 फीसदी ज्यादा है.

यह वास्तव में चौंकाने वाली बात है क्योंकि 59 फीसदी लोग इस बात से सहमत हैं कि एनडीए के सत्ता में आने के बाद से महंगाई ज्यादा रही है और रोजगार का संकट बढ़ा है (36 फीसदी मानते हैं कि नए रोजगार गायब हैं और बेरोजगारी की हालत नई सरकार में बदतर हुई है, यह पिछले सर्वे के मुकाबले 1 फीसदी और फरवरी 2016 के देश का मिज़ाज सर्वे के मुकाबले 4 फीसदी ज्यादा है). सभी चार क्षेत्रों में लोगों ने कहा कि रोजगार की तस्वीर और खराब हो चुकी है, जबकि केवल 26 फीसदी ने माना कि इसमें थोड़ा सुधार हुआ है. उत्तर और दक्षिण में सर्वे में शामिल ज्यादातर लोगों ने माना कि रोजगार की हालत बहुत बुरी है.

तब ऐसी क्या बात है कि लोग अब भी मान रहे हैं कि  प्रधानमंत्री मोदी ने कोई आर्थिक चमत्कार कर डाला है? एक बात तो यह हो सकती है कि मुद्रास्फीति और बढ़ सकती थी लेकिन उसे दो साल से 5 फीसदी पर रोके रखा गया है. हालांकि उसकी एक वजह कच्चे तेल के दामों में आई गिरावट भी है. दूसरी बात जीएसटी पर राज्यों के बीच एक सहमति है जो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सुनिश्चित की. इससे बहुत-से लोग आश्वस्त हुए हैं कि इस साल जुलाई से परोक्ष करों के मामले में एक बड़ा सुधार देखने में आएगा. तीसरी बात नोटबंदी की है जिससे यह धारणा बनी है कि मौजूदा सरकार ने ऊंचे ओहदों पर भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए पिछली सरकार से बेहतर काम किया है. इसीलिए 53 फीसदी लोगों का कहना था कि मोदी सरकार के दौर में उनकी आर्थिक सेहत सुधरी है. यह संख्या अगस्त के सर्वे में 40 फीसदी थी और फरवरी के सर्वे में 43 फीसदी थी. पूरब और पश्चिम के राज्यों के ज्यादातर लोगों ने और हिंदुओं ने माना है कि मोदी के राज में उनकी आर्थिक सेहत सुधरी है.

इस सकारात्मक धारणा के बावजूद अच्छी-खासी संख्या (67 फीसदी) में लोगों ने माना है कि संपत्ति के दाम अब भी ज्यादा हैं और औसत खरीदार के दायरे से बाहर हैं. माना जा रहा था कि रियल एस्टेट सेक्टर में बड़े बदलाव आएंगे जिनकी दो वजहें रहीं—एक रियल एस्टेट (नियमन और विकास) कानून, जिससे इसके और ज्यादा पारदर्शी और उपभोक्ता हितैषी बनने की संभावना थी और दूसरा नोटबंदी, जिससे काले धन का सफाया होता. ये बदलाव हालांकि लंबी अवधि में शायद जमीन पर उतर पाएं. खरीदार अब भी बाजार से दूर हैं क्योंकि उन्हें दाम गिरने का इंतजार है और उम्मीद है कि बैंक आवासीय कर्ज पर ब्याज दर को कम करेंगे. इसके अलावा, महंगाई और रोजगार संकट को लेकर चिंताएं दिखाती हैं कि मोदी सरकार को इन क्षेत्रों में अभी और काम करना है

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