कहीं ऐसा न हो कि चिंता करते-करते आप भूल जाएं कि चिंता किस बात की है...

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आज जिसे देखें वो दौड़ता भागता रहता है, दिन खत्‍म हो जाता है पर काम नहीं। और इसी भागदौड़ की देन है चिंता और तनाव... लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि ये चिंता आपके लिए किस हद तक नुकसानदेय हो सकती है। लंबे समय तक अगर आप चिंताग्रस्‍त रहते हैं तो यह डिमेंशिया का खतरा बढ़ा सकती है।

क्‍यों होता है ऐसा 
ज्‍यादातर लोग अपने जीवन से चिंता और तनाव को दूर करने के तरीके ढूंढ़ते रहते हैं, लेकिन इसी चिंता को दूर करते-करते वह अवसाद और डिमेंशिया का शिकार हो जाते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के सहायक प्रोफेसर लिंडा माह के अनुसार, "लंबे समय तक चिंता, भय, तनाव की स्थिति में मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधि प्रभावित होती है, जिसकी वजह से मानसिक विकार, अवसाद और अल्जाइमर रोग होने की संभावना रहती है।"

क्‍या कहता है शोध
शोधार्थियों का कहना है, "सामान्य स्थितियों में चिंता और तनाव जिंदगी के आम हिस्से के रूप में जाना जाता है लेकिन अगर यह बार-बार और लंबे समय तक रहता है तो इससे दिनचर्या की सामान्य गतिविधियां प्रभावित होती हैं। लंबे समय तक यह समस्या रहने से व्यक्ति मानसिक रोग का शिकार हो सकता है।" यह शोध 'करंट ओपिनियन इन साइकियाट्री' में प्रकाशित किया गया है। 

क्‍या बला है डिमेंशिया
डिमेंशिया यानी मनोभ्रंश किसी एक बीमारी का नाम नहीं, बल्कि के लक्षणों के समूह का नाम है। इनसे दिमाग को नुकसान पहुंच सकता है और क्‍योंकि हमारे शारीर को हमारा दिमाग ही नियंत्रित करता है, इसलिए डिमेंशिया के चलते इससे पीडि़त व्‍यक्ति अपने नियमित काम ठीक से नहीं कर पाता। उसकी याददाश्त भी कमज़ोर हो सकती है। वह अक्‍सर भूल जाता है कि वह किस शहर में रहता है या कौन सा साल या महीना चल रहा है। आमतौर पर डिमेंशिया को बुढ़ापे की बीमारी माना जाता है, लेकिन आजकल गलत खानपान, तनाव और खराब जीवनशैली कब आपको इसका शिकार बना दें, कह नहीं सकते।

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