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जंतर-मंतर पर ही नजर जाती है क्या कीजै

-कमलेश भारतीय
अब भी ध्यान जंतर-मंतर की ओर ही चला जा रहा है । बहुत कोशिश करता हूं कि जंतर-मंतर की ओर न देखूं लेकिन रोती हुईं महिला पहलवानों को देखकर मन फिर फिर उसी ओर चला जा रहा है । जैसे उड़ी जहाज को पंछी , फिर जहाज पे जावै ! आखिर इन बेटियों को इस हाल में दिल्ली के फुटपाथ पर बैठीं देखकर आपका मन नहीं पसीजता ? पुलिस द्वारा इन महिला पहलवानों के साथ जो अभद्र व्यवहार किया जा रहा है , क्या वह आपको विचलित नहीं करता या अभी इससे भी ज्यादा कुछ होने पर ही आप पिघलेंगे? जिन महिला पहलवानों के गोल्ड मेडल जीतने पर आप मन की बात में इन्हें देश का गौरव कहते थकते नहीं थे , आज इनकी आंखों में आंसू आप कैसे देख रहे हैं चुपचाप ? क्या ये आपकी बेटियां नहीं हैं अब ? क्या ये देश की गौरव नहीं है अब ? अपने ऊपर हुए यौन शोषण की आवाज उठातीं क्या ये खलनायिकायें लगने लगीं ? क्या आधी रात को पुलिस इस तरह इनके साथ बर्बर व्यवहार किसकी शह पर कर रही है ? कौन है वह जो आपकी छवि धूमिल कर रहा है ? उस काली भेड़ को समय रहते पहचान लीजिये । कुछ लोग तो यह कहने लगे हैं कि जंतर-मंतर पर बैठीं महिला पहलवानों के मामले में भी सरकार किसान आंदोलन जैसी भूल करने जा रही है जो समय पर इसका कोई हल नहीं कर रही । खापों और किसानों ने दिल्ली की ओर कूच शुरू कर दिये हैं । गीता फौगाट को राह में ही रोकने की कोशिश की गयी । बजरंग पूनिया ने कहा है कि हम अपने मेडल लौटा देंगें यदि हमारा यही सम्मान सरकार की नजरों में है तो इन मेडलों का क्या करना है हमें ? महावीर फौगाट भी अपना सम्मान लौटाने की कह रहे हैं । यही तो हैं महिला पहलवानों को अखाड़े तक लाने वाले , सारे जमाने का विरोध सहकर भी ! ये पद्मश्री किस काम की ? सड़क पर लाकर बैठा दिये और वहां से भी खदेड़ते जा रहे हैं । शांतिपूर्ण प्रदर्शन का हक भी नहीं इन्हें क्या ? राजनीतिक अखाड़े में बदलता जा रहा है यह धरना । महिला पहलवानों की किसी को कोई चिंता कहां ? क्या इस दिन के लिये महिला पहलवानों ने अखाड़ों में पसीना बहाया था ? दांव पेच सीखे थे ? काश! राजनीति के दाव पेच भी सीख लिये होते ! नहीं ये तो कतई अच्छे दिन नहीं हैं ! ऐसे अच्छे दिन तो किसी के न आयें ! पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है कि बृजभूषण शरण सिंह को गोदी मीडिया ने टीवी स्टार बना दिया जिस पर आरोप लगाये , उसे हीरो दिखा रहे हैं ! धन्य है गोदी मीडिया ! शर्म मगर तुम्हें नहीं आती !
इस सबके बावजूद यही दुआ है कि महिला पहलवान की इज्जत को राजनीतिक अखाड़ा न बनाइये ! ये हमारी बेटियां हैं ! इनके आंसू देखिये और पोंछने के लिये आगे आइये ! छोड़कर राजनीतिक हठ । यही हठ किसान आंदोलन के समय था और फिर झुकने के लिये मजबूर होना पड़ा। अभी समय है । इन बेटियों की पुकार सुन लीजिये !
दुष्यंत कुमार सही कह रहे हैं
तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं
कमाल यह है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं !

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