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 गोबिंद सिंह चेहरे पर सुनहरा रंग लगाए चौक में मूर्ति बनकर खड़ता है 

चेहरे पर सोने की पुताई लगाकर चौक में मूर्ति बनकर खड़ा होना और राजमिस्त्री के साथ दिहाड़ी पर जाना गोबिंद सिंह के जीवन के दो पहलू हैं। गोबिंद सिंह मूर्ति के रूप में पिछले ढाई साल से ऐसा कर रहे हैं। हालांकि उन्हें ऐसा करना पसंद है । उनका कहना है कि कई लोग उन्हें मूर्ति के रूप में देखना अच्छा समझते हैं और कई बहुत बुरा-भला कहकर गुजर जाते हैं।

पिता की चोट के कारण घर की जिम्मेदारी उन पर आ गई गोबिंद सिंह ने कहा, बचपन से ही मूर्ति बनने की इच्छा थी, लेकिन पिता की चोट के कारण घर की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई. वह कहते हैं, ”दिवाली के दिन पैसे के अभाव में मजबूर होकर मुझे ऐसा करना पड़ा. गोबिंद ने बताया कि उसकी एक बहन की शादी हो चुकी है, उसके पास भी जाना था.” मेरे लिए यह काफी मजबूरी हो गई और जेब में मेरे पास डेढ़ से दो सौ रुपये बचे थे.वहां से यह कहानी शुरू हुई. मेरे पास जो 200 रुपये थे, और मैंने उसी केे साथ काम शुरू किया उन्होंने घर से टी-शर्ट,पजामा और टोपी ली और अपने चेहरे पर रंग लगा कर तैयार हो गया गोबिंद घर में इकलौता कमाने वाला है। गोबिंद ने कहा कि वह रोज काम करता है और दिहाड़ी करके जब समय मिलता है तो अपना हुनर ​​दिखाने के लिए मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता है। गोबिंद ने कहा कि लोग मेरे साथ सेल्फी लेने आते हैं गोविंद ने कहा सेल्फी लेनेेे की बजाय लोगों को मेरी मदद भी करनी चाहिए गोबिंद कहते हैं कि अच्छा बनने और अच्छी जिंदगी जीने का सपना हर किसी का होता है।

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